Kyunki Main Hoon..

ना खुद को बड़ा जाना, ना अस्तित्व को अपने,

जाना तो सिर्फ ये की इश्वर की कल्पना हूँ.

अधूरा सा जहां था मेरे बगैर शायद,

पूरा करे जो उसको मैं वो ही चेतना हूँ.


अगणित हैं रूप मेरे, अगणित सी छटाएं हैं,

समा सके किसीमे वो शब्द बहुत कम हैं.

ना एक नाम मेरा, ना एक ही जनम है,

कण कण में मेरे बसता पीढ़ियों का एक संगम है.


ममता की मैं हूँ मूरत, मुझमें ही प्रेमिका भी,

संसार चलता मुझसे, और मुझसे ही बढ़ता भी.

जिस राह पर चली मैं उसे पूरा निभाया है,

मैं जननी, अन्नपूर्णा और मार्गदर्शिका भी.


ना हार मानी मैंने, ना टूटना है जाना,

विपरीत भी जहाँ हो, खुद ना कम है माना.

इश्वर ने श्रेष्टता का वरदान जो दिया है,

उसमे यकीन करके,संसार को है पाना.
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9 thoughts on “Kyunki Main Hoon..

  1. Reblogged this on A Vibrant Palette and commented:

    I had written this poem for the Women’s Day function in one of Mom’s social clubs. She had read it out on stage and gotten very emotional while doing it. Undoubtedly, this is one of my favourites! Hope you all like it too. ☺

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